Monday, 15 August 2016

संभावित परीक्षा तिथि

व्यापम द्वारा घोषित की गयी संविदा शाला शिक्षक पात्रता परीक्षा 2017 की तिथियां :
संविदा शाला शिक्षक वर्ग 01 -27 से  29 मई 2017
संविदा शाला शिक्षक वर्ग 2-09 से 15 September 2017
संविदा शाला शिक्षक वर्ग 03-09 से 14 August  2017
उपरोक्त तिथियां व्यापम की वेवसाइट पर अपलोड के अनुसार है

बाल विकास के सिद्धांत


मानव का विकास, उनमें होने वाले मानसिक और शारीरिक परिवर्तनों की एक श्रृंखला है जो भ्रूणावस्था से प्रारंभ होकर वृद्धावस्था तक चलता है. यह निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है तथा जन्म से लेकर मृत्यु तक चलती रहती है. विकास एक निश्चित दिशा में होता है यह विकास सामान्य से विशिष्ट की और होता है. ये विकास व्यक्ति में नवीन योग्यताएं एवं विशिष्टताएं लाती है. ये सारे विकास एक निश्चित नियम के अनुपालन में होता है. इन्हें ही बाल विकास का सिद्धांत कहा गया है. बाल विकास के कुछ बाल विकास के कुछ सिद्धांत निम्नलिखित हैं:
  1. निरंतरता का सिद्धांत : विकास एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है जो गर्भधारण से म्रत्यु पर्यंत चलता है
  2. विकास सामान्य से विशिष्ट की ओर होता है: विकास क्रम का व्यवहार सामान्य से विशिष्ट की ओर होता है अर्थात् मनुष्य के विकास के सभी क्षेत्रों में सामान्य प्रतिक्रिया होती है उसके बाद विशिष्ट रूप धारण करती है. जैसे एक नवजात शिशु प्रारम्भ में एक समय में अपने पूरे शरीर को चलाता है फिर धीरे-धीरे विशिष्ट अंगों का उपयोग करने लगता है.
  3. परस्पर सम्बन्ध का सिद्धांत :किशोरावस्था के दौरान शरीर के साथ साथ संवेगात्मक , सामाजिक , संज्ञानात्मक एवं क्रियात्मकता भी तेजी से होता है . 
  4. विकास अवस्थाओं के अनुसार होता है: सामान्य रूप में देखने पर एसा लगता है कि बालक का विकास रुक-रुक कर हो रहा है परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं होता. उदहारण के लिए जब बालक के दूध के दांत निकलते हैं तप ऐसा लगता है कि एकाएक निकल गया परन्तु इसकी नीव गर्भावस्था के पांचवे माह में पद जाती है और 5-6 महीने में आती है
  5. विकास एक सतत प्रक्रिया है: विकास एक सतत प्रक्रिया है, मनुष्य के जीवन में यह चलता रहता है. विकास की गति कभी तीव्र या अमंद हो सकती है. मनुष्य में गुणों का विकास यकायक नहीं होता. जैसे शारीरिक विकास गर्भावस्था से लेकर परिपक्वावस्था तक निरंतर चलता रहता है. परन्तु आगे चलकर बालक उठने-बैठने, चलने फिरने और दौड़ने भागने लगता है.
  6. बालक के विभिन्न गुण परस्पर सम्बंधित होते हैं: बालक के विकास का विभिन्न स्वरूप परस्पर सम्बंधित होते हैं. एक गुण का विकास जिस प्रकार हो रा है अन्य गुण भी उसी अनुपात में विकसित होंगे. उदहारण के लिए जिस बालक में शारीरिक क्रियाएँ जल्दी होती है वह शीघ्रता से बोलने भी लगता है जिससे उसके भीतर सामाजिकता का विकास तेजी से होता है. इसके विपरीत जिन बालकों के शारीरिक विकास की गति मंद होती है उनमें मानसिक तथा अन्य विकास भी देर से होता है.
  7. विभिन्न अंगों के विकास की गति में भिन्नता पाई जाती है: शरीर के विभिन्न अंगों के विकास की दर एक समान नहीं होता इनके विकास की गति में भिन्नता पाई जाती है. शरीर के कुछ अंग तेज गति से बढ़ते है ओर कुछ मंद गति से जैसे- मनुष्य की 6 वर्ष की आयु तक मस्तिष्क विकसित होकर लगभग पूर्ण रूप धारण कर लेता है, जबकि मनुष्य के हाथ, पैर, नाक मुंह, का विकास किशोरावस्था तक पूरा हो जाता है.
  8. विकास की गति एक समान नहीं होती: मनुष्य के विकास का क्रम एक समान हो सकता है, किन्तु विकास की गति एक समान नहीं होती जैसे- शैशवावस्था और किशोरावस्था में बालक के विकास की गति तीव्र होती है लेकिन आगे जाकर मंद हो जाती है और प्रौढ़ावस्था के बाद रुक जाती है. पुनः बालक ओर बालिकाओं के विकास की गति में भी अंतर होता है.
  9. विकास की प्रक्रिया का एकीकरण होता है: विकास की प्रक्रिया एकीकरण के सिद्धांत का पालन करती है. इसके अनुसार बालक पहले अपने सम्पूर्ण अंग को और फिर अंग के भागों को चलाना सीखता है बाद में वह इन भागों का एकीकरण करना सीखता है.
  10.  विकास का एक निश्चित प्रतिरूप होता है: मनुष्य के विकास का एक क्रम में होता है और विकास की गति का प्रतिमान भी समान रहता है. सम्पूर्ण विश्व में सभी सामान्य बालकों का गर्भावस्था या जन्म के बाद विकास का क्रम सिर से पैर की ओर होता है. गेसेल और हरलॉक ने इस सिद्धांत की पुष्टि की है.
  11. विकास बहुआयामी होता है : इसका  मतलब है की विकास कुछ छेत्रों में अधिक व कुछ में कम होता है . 
  12. विकास बहुत ही लचीला होता है : इसका मतलब यह है की विकास किसी व्यक्ति अपनी पिछली कक्छा की विकास दर की तुलना में किसी विशेष छेत्र में विशेष योग्यता प्राप्त कर लेता है यह उसके परिवेश आदि पर निर्भर करता है .
  13. विकास प्रासंगिक हो सकता है : विकास एतिहासिक ,परिवेशीय , सामाजिक - संस्कृतिक घटकों से प्रभावित होता है .  
  14. व्यक्तिक अंतर का सिद्धांत : विकासात्मक परिवर्तनों की दर में व्यक्तिगत अंतर हो सकता है और यह अनुवंशकीय घटकों व सामाजिक परिवेश पर निर्भर करता है . जैसे एक 3 वर्ष का बालक औसत 3 शब्दों के वाक्य आसानी से बोल लेता है वन्ही कुछ ऐसे भी बच्चे होतें है जो यह योग्यता 2 वर्ष की आयु में ही प्राप्त कर लेतें है तो कही ऐसे भी बचें होते है यो 4 वर्ष की आयु में भी वाक्य बोलने में कठिनाई महसूस करतें है . 
  15. वृद्धि एवं विकास की गति की दर एक समान नहीं होती .
  16. विकास की प्रक्रिया एकीकरण के सिद्धांत का पालन करती हैं .
  17. वृद्धि एवं विकास की क्रिया  वंशानुक्रम एवं वातावरण का परिणाम है 
1. बाल विकास अध्ययन है - 
A. बालक के व्यवहारों का 
B. विकास को प्रभावित करने वाले तत्वों का 
C. बालकों के विकास के विभिन्न छेत्रों का 
D. उपयुक्त सभी का 
2. विकास से तात्पर्य है - 
A.गुणात्मक परिवर्तन से 
B परिणामात्मक परिवर्तन से 
C उपयुक्त दोनों से 
D इनमे से कोई नहीं 
3. विकास की प्रक्रिया ( संरचनावादियो के अनुसार ) - 
A एक सतत प्रक्रिया होती है 
B एक असतात प्रक्रिया होती है 
C रुक रुक कर होने वाली प्रक्रिया होती है 
D उपयुक्त में से कोई नहीं
4. वेंदुरा स्किनर ने विकास को -
 A एक सतत प्रक्रिया होती है 
B एक असतात प्रक्रिया होती है 
C रुक रुक कर होने वाली प्रक्रिया होती है 
D उपयुक्त में से कोई नहीं
5. निम्नलिखित में से कौन मानव विकास को सर्वाधिक प्रभावित करता है - 
A बुद्धि 
B कौशल 
C रोग 
D वंशानुक्रम एवं वातावरण
6. " विकास एक एईसी प्रक्रिया है जो व्यक्ति के जन्म से लेकर उस समय तक चलती रहती है जब तक की वह पूर्ण विकास को प्राप्त नही हो जाता है "  ये कथन किसका है ? 
A हेडफील्ड का                       B गार्डन का 
C पियाजे का                            D  गिसेल का   
7. किस मनोवैज्ञानिक के अनुसार " विकास एक प्रकार का परिवर्तन है जिसके द्वारा बालकों में नविन गुणों एवं छमताओं का विकास होता है "
A हेडफील्ड का                       B गार्डन का 
C पियाजे का                            D  गिसेल का   
8. "विकास प्राणी में प्रगतिशील परिवर्तन है , जो निश्चित लक्ष्यों की और निरंतर निर्देशित होता रहता है ." यह कथन है - 
A हरलोक का                           B  फ्रायड का 
C ड्रेवर का                                D  मुनरो का  
9. अर्नेस्ट जोन्स के अनुसार , शैशवावस्था जन्म से कितने वर्ष तक मणि जाती है ? 
A जन्म से 2 वर्ष तक 
B जन्म से 3 वर्ष तक 
C जन्म से 4 वर्ष तक 
D जन्म से 5 वर्ष तक
10. अर्नेस्ट  जोन्स के अनुसार विकास की अवस्था नहीं है - 
A शैशवावस्था                               B बाल्यावस्था 
C  किशोरावस्था                            D  पौडावस्था 
उत्तर 
1. D  2.C  3.B  4.A   5.D   6.D       7 D.  8.C   9 D.          10. D.

बाल विकास के सिद्धांत

बाल विकास के सिद्धांत
मानव का विकास, उनमें होने वाले मानसिक और शारीरिक परिवर्तनों की एक श्रृंखला है जो भ्रूणावस्था से प्रारंभ होकर वृद्धावस्था तक चलता है. यह निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है तथा जन्म से लेकर मृत्यु तक चलती रहती है. विकास एक निश्चित दिशा में होता है यह विकास सामान्य से विशिष्ट की और होता है. ये विकास व्यक्ति में नवीन योग्यताएं एवं विशिष्टताएं लाती है. ये सारे विकास एक निश्चित नियम के अनुपालन में होता है. इन्हें ही बाल विकास का सिद्धांत कहा गया है. बाल विकास के कुछ बाल विकास के कुछ सिद्धांत निम्नलिखित हैं:
  1. निरंतरता का सिद्धांत : विकास एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है जो गर्भधारण से म्रत्यु पर्यंत चलता है
  2. विकास सामान्य से विशिष्ट की ओर होता है: विकास क्रम का व्यवहार सामान्य से विशिष्ट की ओर होता है अर्थात् मनुष्य के विकास के सभी क्षेत्रों में सामान्य प्रतिक्रिया होती है उसके बाद विशिष्ट रूप धारण करती है. जैसे एक नवजात शिशु प्रारम्भ में एक समय में अपने पूरे शरीर को चलाता है फिर धीरे-धीरे विशिष्ट अंगों का उपयोग करने लगता है.
  3. परस्पर सम्बन्ध का सिद्धांत :किशोरावस्था के दौरान शरीर के साथ साथ संवेगात्मक , सामाजिक , संज्ञानात्मक एवं क्रियात्मकता भी तेजी से होता है . 
  4. विकास अवस्थाओं के अनुसार होता है: सामान्य रूप में देखने पर एसा लगता है कि बालक का विकास रुक-रुक कर हो रहा है परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं होता. उदहारण के लिए जब बालक के दूध के दांत निकलते हैं तप ऐसा लगता है कि एकाएक निकल गया परन्तु इसकी नीव गर्भावस्था के पांचवे माह में पद जाती है और 5-6 महीने में आती है
  5. विकास एक सतत प्रक्रिया है: विकास एक सतत प्रक्रिया है, मनुष्य के जीवन में यह चलता रहता है. विकास की गति कभी तीव्र या अमंद हो सकती है. मनुष्य में गुणों का विकास यकायक नहीं होता. जैसे शारीरिक विकास गर्भावस्था से लेकर परिपक्वावस्था तक निरंतर चलता रहता है. परन्तु आगे चलकर बालक उठने-बैठने, चलने फिरने और दौड़ने भागने लगता है.
  6. बालक के विभिन्न गुण परस्पर सम्बंधित होते हैं: बालक के विकास का विभिन्न स्वरूप परस्पर सम्बंधित होते हैं. एक गुण का विकास जिस प्रकार हो रा है अन्य गुण भी उसी अनुपात में विकसित होंगे. उदहारण के लिए जिस बालक में शारीरिक क्रियाएँ जल्दी होती है वह शीघ्रता से बोलने भी लगता है जिससे उसके भीतर सामाजिकता का विकास तेजी से होता है. इसके विपरीत जिन बालकों के शारीरिक विकास की गति मंद होती है उनमें मानसिक तथा अन्य विकास भी देर से होता है.
  7. विभिन्न अंगों के विकास की गति में भिन्नता पाई जाती है: शरीर के विभिन्न अंगों के विकास की दर एक समान नहीं होता इनके विकास की गति में भिन्नता पाई जाती है. शरीर के कुछ अंग तेज गति से बढ़ते है ओर कुछ मंद गति से जैसे- मनुष्य की 6 वर्ष की आयु तक मस्तिष्क विकसित होकर लगभग पूर्ण रूप धारण कर लेता है, जबकि मनुष्य के हाथ, पैर, नाक मुंह, का विकास किशोरावस्था तक पूरा हो जाता है.
  8. विकास की गति एक समान नहीं होती: मनुष्य के विकास का क्रम एक समान हो सकता है, किन्तु विकास की गति एक समान नहीं होती जैसे- शैशवावस्था और किशोरावस्था में बालक के विकास की गति तीव्र होती है लेकिन आगे जाकर मंद हो जाती है और प्रौढ़ावस्था के बाद रुक जाती है. पुनः बालक ओर बालिकाओं के विकास की गति में भी अंतर होता है.
  9. विकास की प्रक्रिया का एकीकरण होता है: विकास की प्रक्रिया एकीकरण के सिद्धांत का पालन करती है. इसके अनुसार बालक पहले अपने सम्पूर्ण अंग को और फिर अंग के भागों को चलाना सीखता है बाद में वह इन भागों का एकीकरण करना सीखता है.
  10.  विकास का एक निश्चित प्रतिरूप होता है: मनुष्य के विकास का एक क्रम में होता है और विकास की गति का प्रतिमान भी समान रहता है. सम्पूर्ण विश्व में सभी सामान्य बालकों का गर्भावस्था या जन्म के बाद विकास का क्रम सिर से पैर की ओर होता है. गेसेल और हरलॉक ने इस सिद्धांत की पुष्टि की है.
  11. विकास बहुआयामी होता है : इसका  मतलब है की विकास कुछ छेत्रों में अधिक व कुछ में कम होता है . 
  12. विकास बहुत ही लचीला होता है : इसका मतलब यह है की विकास किसी व्यक्ति अपनी पिछली कक्छा की विकास दर की तुलना में किसी विशेष छेत्र में विशेष योग्यता प्राप्त कर लेता है यह उसके परिवेश आदि पर निर्भर करता है .
  13. विकास प्रासंगिक हो सकता है : विकास एतिहासिक ,परिवेशीय , सामाजिक - संस्कृतिक घटकों से प्रभावित होता है .  
  14. व्यक्तिक अंतर का सिद्धांत : विकासात्मक परिवर्तनों की दर में व्यक्तिगत अंतर हो सकता है और यह अनुवंशकीय घटकों व सामाजिक परिवेश पर निर्भर करता है . जैसे एक 3 वर्ष का बालक औसत 3 शब्दों के वाक्य आसानी से बोल लेता है वन्ही कुछ ऐसे भी बच्चे होतें है जो यह योग्यता 2 वर्ष की आयु में ही प्राप्त कर लेतें है तो कही ऐसे भी बचें होते है यो 4 वर्ष की आयु में भी वाक्य बोलने में कठिनाई महसूस करतें है . 
  15. वृद्धि एवं विकास की गति की दर एक समान नहीं होती .
  16. विकास की प्रक्रिया एकीकरण के सिद्धांत का पालन करती हैं .
  17. वृद्धि एवं विकास की क्रिया  वंशानुक्रम एवं वातावरण का परिणाम है 
1. बाल विकास अध्ययन है - 
A. बालक के व्यवहारों का 
B. विकास को प्रभावित करने वाले तत्वों का 
C. बालकों के विकास के विभिन्न छेत्रों का 
D. उपयुक्त सभी का 
2. विकास से तात्पर्य है - 
A.गुणात्मक परिवर्तन से 
B परिणामात्मक परिवर्तन से 
C उपयुक्त दोनों से 
D इनमे से कोई नहीं 
3. विकास की प्रक्रिया ( संरचनावादियो के अनुसार ) - 
A एक सतत प्रक्रिया होती है 
B एक असतात प्रक्रिया होती है 
C रुक रुक कर होने वाली प्रक्रिया होती है 
D उपयुक्त में से कोई नहीं
4. वेंदुरा स्किनर ने विकास को -
 A एक सतत प्रक्रिया होती है 
B एक असतात प्रक्रिया होती है 
C रुक रुक कर होने वाली प्रक्रिया होती है 
D उपयुक्त में से कोई नहीं
5. निम्नलिखित में से कौन मानव विकास को सर्वाधिक प्रभावित करता है - 
A बुद्धि 
B कौशल 
C रोग 
D वंशानुक्रम एवं वातावरण
6. " विकास एक एईसी प्रक्रिया है जो व्यक्ति के जन्म से लेकर उस समय तक चलती रहती है जब तक की वह पूर्ण विकास को प्राप्त नही हो जाता है "  ये कथन किसका है ? 
A हेडफील्ड का                       B गार्डन का 
C पियाजे का                            D  गिसेल का   
7. किस मनोवैज्ञानिक के अनुसार " विकास एक प्रकार का परिवर्तन है जिसके द्वारा बालकों में नविन गुणों एवं छमताओं का विकास होता है "
A हेडफील्ड का                       B गार्डन का 
C पियाजे का                            D  गिसेल का   
8. "विकास प्राणी में प्रगतिशील परिवर्तन है , जो निश्चित लक्ष्यों की और निरंतर निर्देशित होता रहता है ." यह कथन है - 
A हरलोक का                           B  फ्रायड का 
C ड्रेवर का                                D  मुनरो का  
9. अर्नेस्ट जोन्स के अनुसार , शैशवावस्था जन्म से कितने वर्ष तक मणि जाती है ? 
A जन्म से 2 वर्ष तक 
B जन्म से 3 वर्ष तक 
C जन्म से 4 वर्ष तक 
D जन्म से 5 वर्ष तक
10. अर्नेस्ट  जोन्स के अनुसार विकास की अवस्था नहीं है - 
A शैशवावस्था                               B बाल्यावस्था 
C  किशोरावस्था                            D  पौडावस्था 
उत्तर 
1. D  2.C  3.B  4.A   5.D   6.D       7 D.  8.C   9 D.          10. D.

Sunday, 14 August 2016

विकास की अवधारणा

विकास की प्रकिर्या सतत यानि लगातार चलने वाली प्रकिर्या है I विकास की प्रक्रिया में बालक का सम्पूर्ण विकास होता है जैसे संवेगात्मक विकास , शारीरिक विकास  ,संज्ञानात्मक विकास , भाषागत विकास एवं सामाजिक विकास .
बाल विकास एक व्यापक अवधारणा है जिसके अंतर्गत मनुष्य में जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत तक होने वाले सभी परिमाणात्मक तथा गुणात्मक परिवर्तनों को सम्मिलित किया जाता है. अर्थात बढ़ती उम्र के साथ मनुष्य की शारीरिक संरचना या आकार, लम्बाई, भार और आतंरिक अंगों में होने वाले परिवर्तनों के साथ-साथ मानसिक, भावनात्मक, सामाजिक, बौद्धिक आदि पक्षों में परिपक्वता विकास कहलाती है.
विकास एक क्रमिक तथा निरंतर चलने वाली सतत प्रक्रिया है, जो शारीरिक वृद्धि के अवरुद्ध हो जाने के बाद भी चलता रहता है तथा जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत चलता रहता है. यह क्रमबद्ध रूप से होने वाले सुसंगत परिवर्तनों की क्रमिक श्रृंखला है. कहने का तात्पर्य यह है कि ये परिवर्तान एक निश्चित दिशा में होते हैं जो सदैव आगे की ओर उन्मुक्त रहती है.
वृद्धि तथा विकास में अंतर: आमतौर पर वृद्धि तथा विकास का अर्थ एकसमान मान लिया जाता है लेकिन मनोवैज्ञानिक अवधारणा के अनुसार ये परस्पर भिन्न होते हैं. वृद्धि शब्द का प्रयोग, बढ़ती उम्र के साथ व्यक्ति के शारीरिक अंगों के आकार, लम्बाई, और भार में बढ़ोतरी के लिए किया जाता है. मनुष्य जैसे-जैसे बड़ा होता है उसका आकार, लम्बाई, नाक-नक्श आदि में परिवर्तन आने लगता है इसके स्थान पर नए नाक-नक्श आदि प्रकट होने लगता है. अर्थात वृद्धि को मापा जा सकता है किन्तु विकास व्यक्ति की क्रियाओं में निरंतर होने वाले परिवर्तनों में परिलक्षित होता है. अतः मनोवैज्ञानिक अर्थों में विकास केवल शारीरिक आकार, और अंगों में परिवर्तन होना ही नहीं है, यह नई विशेषताओं और क्षमताओं का विकसित होना भी है जो गर्भावस्था से प्रारंभ होकर वृद्धावस्था तक चलता रहता है. विकास के परिणामस्वरूप व्यक्ति में नवीन विशेषताएं और नवीन योग्यताएं प्रकट होती है.
विकास और अधिगम में सम्बन्ध  
अधिगम (learning) का विकास से सीधा सम्बन्ध है. जन्म से ही मनुष्य सीखना प्रारंभ कर देता है और जीवन पर्यंत सीखता रहता है. जैसे-जैसे आयु बढ़ती है मनुष्य अपने अनुभवों के साथ-साथ व्यवहारों में भी परिवर्तन और परिमार्जन करता है वस्तुतः यही अधिगम है इसे ही सीखना कहते हैं. मनुष्य अपने विकास की प्रत्येक अवस्था में कुछ न कुछ अवश्य सीखता है लेकिन प्रत्येक अवस्था में सीखने की गति एक सामान नहीं होती. शैशवास्था में बालक माता के स्तन से दूध पीना सीखता है, बोतल द्वारा दूध पिलाये जाने पर निपल मुहं में कैसे ले यह सीखता है, थोडा बड़े होने पर ध्वनी और प्रकश से प्रतिक्रिया करना सीखता है. इस प्रकार मनुष्य जैसे-जैसे बड़ा होता जाता जाता है अपनी जरूरतों और अनुभवों से सीखता चला जाता है.
स्मरणीय बिंदु 

  1. विकास में उस प्रक्रिया का निरूपण किया जाता है जिसके द्वारा कोई व्यक्ति बढता है और गर्भधारण से मृत्यु पर्यंत के जीवन कल में उसमे परिवर्तन होते है .
  2. विकास व्यवस्थित , नियमित, प्रगत्यात्मक , बहु -आयामी , प्लास्टिक (लचीला ), और प्रासंगिक होता है . 
  3. विकास के प्रमुख प्रभाव छेत्र शारीरिक , संज्ञानात्मक , और सामाजिक -संवेगात्मक होते है . 
  4. आनुवांशिक घटकों का निर्धारण गर्घ-घारण के समय होता है और जेनेटिक सूचनाओ का संवहन जिन्स और गुणसूत्रों द्वारा होता है .
  5. जेनो टाइप्स  से तात्पर्य है वे अभिलक्षण जिनका वहण जेनेटिक्स के मध्यम से होता है परन्तु वे प्रदर्शित नहीं होतें . 
  6. फिनो टाइप्स में वे अभिलक्षण  निरुपित किये जाते है जिन्हें देखा जा सकता है . 
  7. परिवेशीय घटकों का प्रसव-पूर्व एवं पसव उपरांत , दोनों स्थितियों में विकास पर प्रभाव पड़ता है .
  8. माँ का रोग,पोषण , और तनाव, भ्रूण के विकास पर प्रभाव डाल सकता है .
  9. प्रकृति और पालन -पोषण संयुक्त रूप से विकास को प्रभावित करतें है .

बाल विकास का पाठ्यक्रम


  • 1.बाल विकास और अध्यापन (30 प्रश्न) 
  • क) बाल विकास (प्राथमिक विद्यालय का बालक) (15 प्रश्न)
  • विकास की अवधारणा तथा अधिगम के साथ उसका संबंध
  • बालकों के विकास के सिद्धांत
  • आनुवांशिकता और पर्यावरण का प्रभाव
  • ● सामाजिकीकरण प्रक्रियाएं: सामाजिक विश्व और बालक (शिक्षक, अभिभावक और मित्रगण)
  • पियाजे, पावलाव कोलबर्ग और वायगोट्स्की: निर्माण और विवेचित संदर्श
  • बाल-केन्द्र्रित और प्र्रगामी शिक्षा की अवधारणाएं
  • बुद्धि की रचना का आलोचनात्मक स्वरूप और उसका मापन ,बहुआयामी बुद्धि 
  • भाषा और चिंतन
  • ● समाज निर्माण के रूप में लिंग: लिंग भूमिकाएं, लिंग-पूर्वाग्र्रह और शैक्षणिक व्यवहार
  • ● शिक्षार्थियों के मध्य वैयक्तिक विभेद, भाषा, जाति, लिंग, समुदाय, धर्म आदि की विविधता पर आधारित विभेदों को समझाना
  • ● अधिगम के लिए मूल्यांकन और अधिगम का मूल्यांकन के बीच अंतर; विद्यालय आधारित मूल्यांकन, सतत
  • ● एवं व्यापक मूल्यांकन: संदर्श और व्यवहार
  • ● शिक्षार्थियों की तैयारी के स्तर के मूल्यांकन के लिए ;कक्षा में शिक्षण और विवेचित चिंतन के लिए तथा शिक्षार्थी की उपलब्धि के लिए उपयुक्त प्रश्न तैयार करना।

  • ख) समावेशी शिक्षा की अवधारणा तथा विशेष आवश्यकता वाले बालकों को समझना (5 प्रश्न) ● गैर-लाभप्राप्त और अवसर-वंचित शिक्षार्थियों सहित विभिन्न पृष्ठभूमियों से आए शिक्षणार्थियों की आवश्यकताओं को समझना।
  • ● अधिगम संबंधी समस्याए, कठिनाई वाले बालकों की आवश्यकताओं को समझना।
  • ● मेधावी, सृजनशील, विशिष्ट प्र्रतिभावान शिक्षणार्थियों की आवश्यकताओं को समझना।

  • ग) अधिगम और अध्यापन (10 प्रश्न) 
  •  बालक किस प्र्रकार सोचते और सीखते हैं; बालक विद्यालय प्रदर्शन में सफलता प्र्राप्त करने में कैसे और क्यों ‘असफल’ होते हैं।
  • ● अधिगम और अध्यापन की बुनियादी प्रक्रियाएं; बालकों की अधिगम कार्यनीतियां सामाजिक क्रियाकलाप के रूप में अधिगमः अधिगम के सामाजिक संदर्भ।
  • ● एक समस्या समाधानकर्ता और एक ‘वैज्ञानिक अन्वेषक’ के रूप में बालक।
  • ● बालकों में अधिगम की वैकल्पिक संकल्पना;अधिगम प्र्रक्रिया में महत्वपूर्ण चरणों के रूप में बालक की ‘त्रुटियों’ को समझना।
  • ● संज्ञान और संवेग 
  • ● प्र्रेरणा और अधिगम
  • ● अधिगम में योगदान देने वाले कारक - व्यक्तिगत एवं पर्यावरणीय।


  • निर्देशन और परामर्श 
  • अभिक्षमता और उसका मापन 
  • स्मृति और विस्मृति 



गणित का पाठ्यक्रम

गणित (30 प्रश्न)

क) विषय-वस्तु (15 प्रश्न)
● ज्यामिति
● आकार और स्थानिक समझ
● हमारे चारों ओर विद्यमान ठोस पदार्थ
● संख्याएं
● जोड़ना और घटाना
● गुणा करना
● विभाजन
● मापन
● भार
● समय
● परिमाण
● आंकड़ा प्रबंधन
● पैटर्न
● राशि
ख) अध्यापन संबंधी मुद्दे (15 प्रश्न)
● गणितीय/तार्किक चिंतन की प्रकृति; बालक के चिंतन एवं तर्कशक्ति पैटर्नों तथा अर्थ निकालने और अधिगम की कार्यनीतियों को समझना
● पाठ्यचर्या में गणित का स्थान
    *गणित की शिक्षण विधियाँ
● गणित की भाषा
● सामुदायिक गणित
● औपचारिक एवं अनौपचारिक पद्धतियों के माध्यम से मूल्यांकन
● शिक्षण की समस्याएं
● त्रुटि विश्लेषण तथा अधिगम एवं अध्यापन के प्रासंगिक पहलू
● नैदानिक एवं उपचारात्मक शिक्षण

हिंदी का पाठ्यक्रम

हिंदी
2. भाषा l (30 प्रश्न)
क) भाषा बोधगम्यता (15 प्रश्न)
● अनदेखे अनुच्छेदों को पढ़ना - दो अनुच्छेद एक गद्य अथवा नाटक और एक कविता जिसमें बोधगम्यता, निष्कर्ष, व्याकरण और मौखिक योग्यता से संबंधित प्रश्न होंगे (गद्य अनुच्छेद साहित्यिक, वैज्ञानिक, वर्णनात्मक अथवा तर्कमूलक हो सकता है)

ख) भाषा विकास का अध्यापन (15 प्रश्न)
● अधिगम और अर्जन
● भाषा अध्यापन के सिद्धांत
● सुनने और बोलने की भूमिकाः भाषा का कार्य तथा बालक इसे किस प्रकार एक उपकरण के रूप में प्रयोग करते हैं
● मौखिक और लिखित रूप में विचारों के संप्रेषण के लिए किसी भाषा के अधिगम में व्याकरण की भूमिका पर निर्णायक संदर्श
● एक भिन्न कक्षा में भाषा पढ़ाने की चुनौतियां; भाषा की कठिनाइयां, त्रुटियां और विकार
● भाषा कौशल
● भाषा बोधगम्यता और प्रवीणता का मूल्यांकन करना: बोलना, सुनना, पढ़ना और लिखना
● अध्यापन - अधिगम सामग्रियां: पाठ्यपुस्तक, मल्टी मीडिया सामग्री, कक्षा का बहुभाषायी संसाधन
● उपचारात्मक अध्यापन