Sunday, 9 April 2017

विशेषण

विशेषण 

संज्ञा अथवा सर्वनाम शब्दों की विशेषता (गुण, दोष, संख्या, परिमाण आदि) बताने वाले शब्द ‘विशेषण’ कहलाते हैं।

जैसे - बड़ा, काला, लंबा, दयालु, भारी, सुन्दर, कायर, टेढ़ा-मेढ़ा, एक, दो आदि।


  • विशेषण सार्थक शब्दों के आठ भेदों में एक भेद है।
  • व्याकरण में विशेषण एक विकारी शब्द है।

विशेष्य
                                  जिस संज्ञा अथवा सर्वनाम शब्द की विशेषता बताई जाए वह विशेष्य कहलाता है।
उदाहरण *
  •  स्‍वाती सुन्दर है। इसमें ‘सुन्दर’ विशेषण है और ‘स्‍वाती’ विशेष्य है।    
。विशेषण शब्द विशेष्य से पूर्व भी आते हैं और उसके बाद भी।
पूर्व में,
जैसे-
  • थोड़ा-सा जल लाओ।
  • एक मीटर कपड़ा ले आना।

बाद में,
जैसे-
  • यह रास्ता लंबा है।
  • खीरा कड़वा है।

विशेषण के भेद
विशेषण के चार भेद हैं-
  1. गुणवाचक।
  2. परिमाणवाचक।
  3. संख्यावाचक।
  4. संकेतवाचक अथवा सार्वनामिक।
गुणवाचक विशेषण
जिन विशेषण शब्दों से संज्ञा  अथवा सर्वनाम शब्दों के गुण-दोष का बोध हो वे गुणवाचक विशेषण कहलाते हैं। जैसे-
क्रम विशेषण संज्ञा अथवा सर्वनाम
1- भाव -अच्छा, बुरा, कायर, वीर, डरपोक आदि।
2- रंग - लाल, हरा, पीला, सफ़ेद, काला, चमकीला, फीका आदि।
3- दशा - पतला, मोटा, सूखा, गाढ़ा, पिघला, भारी, गीला, ग़रीब, अमीर, रोगी, स्वस्थ, पालतू आदि।
4- आकार -गोल, सुडौल, नुकीला, समान, पोला आदि।
5- समय/काल - अगला, पिछला, दोपहर, संध्या, सवेरा आदि।
6- स्थान - भीतरी, बाहरी, पंजाबी, जापानी, पुराना, ताजा, आगामी आदि।
7- गुण -भला, बुरा, सुन्दर, मीठा, खट्टा, दानी,सच, झूठ, सीधा आदि।
8- दिशा - उत्तरी, दक्षिणी, पूर्वी, पश्चिमी आदि।

परिमाणवाचक विशेषण
जिन विशेषण शब्दों से संज्ञा या सर्वनाम की मात्रा अथवा नाप-तोल का ज्ञान हो वे परिमाणवाचक विशेषण कहलाते हैं।
परिमाणवाचक विशेषण के दो उपभेद है-
निश्चित परिमाणवाचक विशेषण- जिन विशेषण शब्दों से वस्तु की निश्चित मात्रा का ज्ञान हो।
 जैसे-

  •  मेरे सूट में साढ़े तीन मीटर कपड़ा लगेगा। 
  •  दो किलो चीनी ले आओ। 
  •  तीन लिटर दूध गरम करो।


अनिश्चित परिमाणवाचक विशेषण- जिन विशेषण शब्दों से वस्तु की अनिश्चित मात्रा का ज्ञान हो।
जैसे-
  • थोड़ी-सी नमकीन वस्तु ले आओ। 
  • कुछ आम दे दो। 
  • थोड़ा-सा दूध गरम कर दो।


संख्यावाचक विशेषण
जिन विशेषण शब्दों से संज्ञा या सर्वनाम की संख्या का बोध हो वे संख्यावाचक विशेषण कहलाते हैं।
जैसे - एक, दो, द्वितीय, दुगुना, चौगुना, पाँचों आदि।

संख्यावाचक विशेषण के दो उपभेद हैं-
निश्चित संख्यावाचक विशेषण
जिन विशेषण शब्दों से निश्चित संख्या का बोध हो।
जैसे - दो पुस्तकें मेरे लिए ले आना।

निश्चित संख्यावाचक के निम्नलिखित चार भेद हैं -

  1.  गणवाचक - जिन शब्दों के द्वारा गिनती का बोध हो। 
जैसे-
  •  एक लड़का स्कूल जा रहा है।
  • पच्चीस रुपये दीजिए।
  • कल मेरे यहाँ दो मित्र आएँगे।
  •  चार आम लाओ।

 2. क्रमवाचक - जिन शब्दों के द्वारा संख्या के क्रम का बोध हो।
जैसे-
  •  पहला लड़का यहाँ आए।
  •  दूसरा लड़का वहाँ बैठे।
  • राम कक्षा में प्रथम रहा।
  •  श्याम द्वितीय श्रेणी में पास हुआ है।

3. आवृत्तिवाचक - जिन शब्दों के द्वारा केवल आवृत्ति का बोध हो।
जैसे-
  •  मोहन तुमसे चौगुना काम करता है।
  •  गोपाल तुमसे दुगुना मोटा है।

4. समुदायवाचक - जिन शब्दों के द्वारा केवल सामूहिक संख्या का बोध हो।
जैसे-
  • तुम तीनों को जाना पड़ेगा।
  •  यहाँ से चारों चले जाओ।

अनिश्चित संख्यावाचक विशेषण
जिन विशेषण शब्दों से निश्चित संख्या का बोध न हो।

जैसे-कुछ बच्चे पार्क में खेल रहे हैं।

संकेतवाचक विशेषण
जो सर्वनाम संकेत द्वारा संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बतलाते हैं वे संकेतवाचक विशेषण कहलाते हैं।

विशेष - क्योंकि संकेतवाचक विशेषण सर्वनाम शब्दों से बनते हैं, अतः ये सार्वनामिक विशेषण कहलाते हैं। इन्हें निर्देशक भी कहते हैं।

परिमाणवाचक और संख्यावाचक विशेषण में अंतर
जिन वस्तुओं की नाप-तोल की जा सके उनके वाचक शब्द परिमाणवाचक विशेषण कहलाते हैं। जैसे-‘कुछ दूध लाओ’। इसमें ‘कुछ’ शब्द तोल के लिए आया है। इसलिए यह परिमाणवाचक विशेषण है।
जिन वस्तुओं की गिनती की जा सके उनके वाचक शब्द संख्यावाचक विशेषण कहलाते हैं। जैसे-कुछ बच्चे इधर आओ। यहाँ पर ‘कुछ’ बच्चों की गिनती के लिए आया है। इसलिए यह संख्यावाचक विशेषण है। परिमाणवाचक विशेषणों के बाद द्रव्य अथवा पदार्थवाचक संज्ञाएँ आएँगी जबकि संख्यावाचक विशेषणों के बाद जातिवाचक संज्ञाएँ आती हैं।

सर्वनाम और सार्वनामिक विशेषण में अंतर
जिस शब्द का प्रयोग संज्ञा शब्द के स्थान पर हो उसे सर्वनाम कहते हैं। जैसे-वह मुंबई गया। इस वाक्य में वह सर्वनाम है। जिस शब्द का प्रयोग संज्ञा से पूर्व अथवा बाद में विशेषण के रूप में किया गया हो उसे सार्वनामिक विशेषण कहते हैं। जैसे-वह रथ आ रहा है। इसमें वह शब्द रथ का विशेषण है। अतः यह सार्वनामिक विशेषण है।


Saturday, 4 March 2017

बाल विकास अभ्यास 1

1  आधुनिक समय में मनोविज्ञान को ---------------- का विज्ञान माना गया है
A  अनुभूति    
B  मानव प्रक्रिया  
C   व्यवहार  
D.  इनमे से कोई नहीं ।

2    मनोविज्ञान की उत्पत्ति किस शास्त्र से हुई है ।
A    अध्यात्मशास्त्र 
B  जीवशास्त्र 
C   मानवशास्त्र 
दर्शनशास्त्र

3    प्रथम मनोवैज्ञानिक प्रयोगशाला की स्थापना कहा हुई थी ?

A   बर्लिन 
लिपजिंग 
C  अमेरिका  
स्टैनफोर्ड में

4   संकटकालीन प्लग किस ग्रन्थि को कहा जाता है ?
A वक्रग्रन्थि   
B   गलग्रन्थि  
पीयूशग्रन्थि 
D   उपगल ग्रन्थि


निम्न में से थामसन द्वारा प्रतिपादित बुद्धि का  सिद्धान्त कोनसा है?
A “ क” व् “ख” का सिद्धान्त 
B आश्चर्यजनक सिद्धान्त 
मात्रा सिद्धान्त 
D   प्रतिदर्श सिद्धान्त


6   बुद्धि का रेत का सिद्धान्त किस अन्य सिद्धान्त को भी कहा जाता है
एकतत्व सिद्धान्त 
समुहकरक सिद्धान्त 
C   तरल व् ठोस सिद्धान्त 
D   मात्रासिद्धान्त


7   बुद्धि लब्धि मापन के जन्मदाता है
A   स्टर्न 
B    बिने 
C    टरमेंन 
इनमे से कोई नहीं

8   अंतर्मुखी बालक की मुख्य विशेषता होती है

वह कक्षा में सभी से मिलजुलकर रहता है  B. वह पाठ्य सहगामी क्रियाओं में निरंतर भाग लेता है
C   एकांत में रहकर कम बातचीत करने वाला होता है उक्तसभी

9   छोटा कद शारीर भारी और गोल. खाना पीना सोना खुशमिज़ाज़ किस व्यक्तित्व के लक्षण है

A   पिकनिक या स्थूलकाय 
एस्थेनिक या क्षीणकाय 
एथलेटिक या सुन्डोलकाय 
D डिस्प्लास्टिक या मिश्रितकाय

10   जीवन का बसंत काल किस किस अवस्था को कहा जाता है
A   शैशवावस्था को 
B  बाल्यावस्था को 
C   किशोरावस्था को 
प्रौढ़ावस्था को

11   किस प्रकार की बुद्धि वाले व्यक्ति का व्यक्तित्व अंतरमुखी होता है
A      मूर्त बुद्धि वाले का। 
अमूर्त बुद्धि वाले का 
C  A और B दोनों का 
इनमे से कोई नहीं

12   एक बालक को 45 बालक तथा 40 बालिका को जोड़ने का प्रश्न दिया जाता है किंतु वह 40 का गुणा 54 में कर देता है उस बालक में किस प्रकार की अक्षमता दिखती है
डिस्लेक्सिया 
B   डिसग्रफिया  
C   डिस्केलकुलिया 
डिस्प्रेक्सिया

13  मानसिक क्रियाए किस अवस्था में चरमोत्कर्ष पर होती है
बाल्यावस्था में 
B किशोरावस्था में 
सैस्वावस्था में 
D   प्रौढ़ावस्था में

14 बच्चो को विभिन्न प्रकार के अनुभव प्राप्त होते है जब वे
स्वयं कार्य करते है 
B   बाहर घूमने जाते है 
परीक्षा देते है 
पुरस्कार प्राप्त करते

15  अनुकरण एवं दोहराने की तीव्र प्रव्रत्ति निम्न में से किस अवस्था की और संकेत करती है
A   बाल्यावस्था  
किशोरावस्था  
प्रौढ़ावस्था  
D इनमे से कोई नहीं

16  पियाजे के अनुसार कोई बच्चा किस अवस्था में अपने परिवेश की वस्तुओं पहचानने एवं विभेद करने लगता है
इंद्रियजनित अवस्था  
पूर्व संक्रियात्मतक अवस्था  
मूर्त संक्रियात्मक अवस्था 
अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था

17  आपकी कक्षा का एक शिक्षार्थी गुटखा या सुपारी खाकर कक्षा में आता है आप निम्न में से किसे उसकी इस हरकत का जिम्मेदार मानेंगे
A उसकी अन्तः इच्छा 
उसका सामाजिक वातावरण 
उसका आपके प्रति द्वेष 
कक्षा में स्वयं को सबसे अलग दिखाने का उसका तरीका

18  सृजनात्मक के विकास में सहायक नहीं है
खेल  
B   भाषण  
हास्य क्रियाए 
D  निर्माण संबंधी क्रियाए

19 आपकी कक्षा का एक बालक सप्ताह में दो तीन बार भाग जाता है वह बालक है
A   विकलांग बालक 
मंदबुद्धि बालक 
पिछड़ा बालक 
सामान्य बालक

20  पाठ्यक्रम से शिक्षक को क्या लाभ होते है
शिक्षण सरल हो जाता है 
शिक्षक को कक्षा में क्या पडाना है उसका ज्ञान हो जाता है 
C शिक्षण रोचक हो जाता है 
शिक्षक को विद्यालय में क्या कार्य करने चाहिए उसका ज्ञान हो जाता है

21  बोलने के दोष से सम्बंधित नहीं है
आवाज की समस्या  
हकलाना व् तुतलाना 
अशुद्ध उच्चारण 
तेज बोलने वाले

22  निम्न में से क्या किसी बच्चे के भाषा विकास का प्राम्भिक रूप नहीं है
रोना 
B आकलन  
हाव भाव 
बलबलाना

23 एक बालक जिसकी आयु 15 वर्ष है यदि उसकी मानसिक आयु 18 वर्ष हो तो उसकी बुद्धि लब्धि होगी
A  100  
B  110  
C   120 
D  140

24 कितने वर्ष का बालक पूछने पर अपना नाम बता देता है
A दो वर्ष  
B   तीन वर्ष
 चार वर्ष का बालक 
D डेढ़ वर्ष का बालक

25  किस प्रकार से स्थिरता वाले व्यक्ति का उचित व्यक्तित्व होता है
A   सांवेगिक रूप से मजबूत  
शारीरिक रूप से मजबूत 
मानसिक रूप से मजबूत 
D ये सभी

26  बाल विकास का सम्बन्ध किससे है
A छात्र से 
B छात्र और शिक्षक से 
परिवार और समाज से 
D उक्त सभी से

Sunday, 29 January 2017

हिंदी भाषा और विकास

  • संस्कृत , पाली , प्राकृत , अपभ्रंश में  होते हुए हिंदी का विकास हुआ है .
  • हिंदी भाषा का उदभव अपभ्रंश के शौरसेनी , अर्धमागधी और मागधी रूपों से हुआ है .
  •  इतिहास में सबसे पहले नाम आता है पाली का जिसका समय 500ई .पू. से पहली शताब्दी माना गया है . 
  • इसके पश्चात् पहली शताब्दी से पांचवी शताब्दी तक का समय प्राकृत का रहा 
  • प्राकृतों से ही विभिन्न क्षेत्रीय अपभ्रंशो का विकास हुआ मोटे तौर पर अपभ्रंश का समय 500 ई. से 1000  ई तक माना गया है . 
  • आधुनिक आर्यभाषाओं का जन्म अपभ्रंश के विभिन्न क्षेत्रीय रूपों से हुआ है जो इस प्रकार है - 
  1. शौरसेनी - पश्चिमी हिंदी , राजस्थानी , पहाड़ी, गुजरती 
  2. पैशाची - लहंदा  , पंजाबी 
  3. ब्राचद - सिन्धी 
  4. महाराष्ट्री - मराठी 
  5. मागधी - बिहारी , बांग्ला , उड़िया, असमिया 
  6. अर्धमागधी - पूर्वी हिंदी .

Thursday, 19 January 2017

हिंदी वर्ण

  • भाषा की सबसे छोटी इकाई ध्वनि कहलाती है . 
  • उच्चारण प्रक्रिया के आधार पर हिंदी की धव्नियों को दो भागों में बांटा गया है . १. स्वर, २. व्यंजन 
  • स्वर - वे ध्वनियाँ जिनके उच्चारण में कोई अवरोध न हो स्वर कहलातें है . 
  • हिंदी में मुख्या 11 स्वर माने गए है . जिन्हें दो भागों में बांटा गया है . हस्व व दीर्घ 
  • हस्व स्वर - अ , इ, उ , ऋ . कुल 4 
  • दीर्घ स्वर - आ, ई, ऊ , ए , ऐ , ओ , औ कुल 7 
  • प्लुत स्वर - S 
  • उच्चारण स्थान के आधार पर स्वरों का वर्गीकरण 
  अ, आ- कंठ ( गले से ) 
  इ, ई - तालव्य ( ऊपर के दन्त के ऊपर का भाग तालू से ) 
  ऋ - मूर्धन्य ( तालू से पीछे वाला भाग ) 
  उ, ऊ - ओष्ठ्य 
  ए, ऐ - कंठ तालव्य 
  ओ, औ- कंठ ओश्त्य
  अं - नासिक्य 
सभी स्वरों को एक बार उच्चारण करेंगे तो स्वयम उच्चारण स्थान जान सकेंगे . 
  • व्यंजन - वे वर्ण को स्वरों की सहायता से उच्चारित होते है . 
  • हिंदी भाषा में कुल वयंजन 33 + 2 ( उत्क्शिप्त) व्यंजन माने गएँ है . 
  • व्यंजनों को उच्चारण स्थान के आधार पर तिन भागों में बांटा गया है - 
  • 1. स्पर्श व्यंजन - 
  •        क वर्ग - क ख, ग , घ, ड ( कंठ्य )
  •        च वर्ग - च, छ, ज, झ, ज  ( तालु ) 
  •         ट वर्ग - ट , ठ, ड, ढ, ण  (मूर्धन्य ) 
  •        त वर्ग - त , थ, द, ध, न  (वर्त्स्य )
  •        प वर्ग - प , फ, ब, भ, म ( दंतोष्ठय )  ( कुल 25 ) 
  • 2. अन्तस्थ - य ( तालु )  , र (वर्त्स्य ) , ल ,व् (दन्त ओष्ठ्य ),  ( कुल 4) 
  • 3. उष्म - श, स (वर्त्स्य ), ष ( तालु )  , ह.   ( कुल 4 ) 

Thursday, 10 November 2016

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  7. Science 

Tuesday, 8 November 2016

समस्या समाधान और वैज्ञानिक अन्वेषक के रूप में बालक

samvida shikshak
1.अन्वेषण का अर्थ है खोज . नए तथ्यों का संकलन , वैज्ञानिक द्रष्टिकोण , जाँच-पड़ताल का गुण .
2. वैज्ञानिक अन्वेषण: वैज्ञानिक विधि से या द्रष्टिकोण से तार्किक ढंग से नयी चीजों की खोज करना , या पहले से स्थापित तथ्यों की खोजपूर्ण पुनः पहचान करना.
3. विद्यार्थी को कक्षा से बाहर समाज में जाकर अपने इस गुण से जीवन का समायोजन प्राप्त करना होता है .
4. इसके लिए छोटे-छोटे प्रयोग शिक्षक कर सकते है . जैसे-दैनिक जीवन में संपर्क में आने वाले व्यक्तियों के व्यवसाय , कार्यकलाप आदि की जानकारी का प्रयास , जैसे डॉक्टर , अख़बार, डाकिया, वकील, बढाई, मोची, सुनार आदि .
5. बच्चो को वैज्ञानिक अन्वेषक बनाने के लिए उसे अलग-अलग जगह पर भ्रमण पर ले जाना ताकि वे उन चीजों के बारे में जान सके.
6. बच्चों को दुकानदारी , बैंकिंग, आदि के खेल खिलाना.
7. ऐसी परिस्थिति का निर्माण करना ताकि बच्चे वैज्ञानिक यंत्रों, धातुओं, वायु संचार आदि के बारे में स्वयं जानकारी प्राप्त कर सकें .
8. वैज्ञानिक अन्वेषक बालक की पहचान : जब बालक अपने ज्ञान और अनुभव के माध्यम से किसी समस्या के प्रत्येक पहलु के बारे में जिज्ञासापूर्वक जानने लगता है . इसके लिए आवश्यक है की उसके सामने वैज्ञानिक विधि से दैनिक संभाव्य परिस्थिति या समस्याओं को रखा जाएँ.

खोजपूर्ण परियोजना विद्यालय में बच्चे को या समूह को मिलकर दी जानी चाहिए . विशेषकर अवकाश के दिनों में समूह में मनोरंजक प्रोजेक्ट दिया जा सकता है .

शिक्षक को स्वय भी खोज परियोजना का समन्वय करना होता है . वह स्वयं जब अन्वेषक के रूप में वैज्ञानिक विधि प्रस्तुत करता है तभी बालक में अन्वेषण का गुण विकसित होता है जैसे -क्वेस्ट परियोजना में ऑन्लाइन  जुड़कर समूह में खोजपूर्ण प्रोजेक्ट का संचालन करना . 
samvida shikshak

Monday, 31 October 2016

शिक्षण और अधिगम की मुलभुत प्रक्रियाएं

शिक्षण और अधिगम की मुलभुत प्रक्रियाएं ,बच्चों के अधिगम की रणनीतियां ,अधिगम एक सामाजिक प्रक्रिया.
1.अनुभव ,क्रिया-प्रतिक्रिया,निर्देश आदि प्राणी के व्‍यवहार में परिवर्तन लाते रहते है .यह अधिगम का व्यापक अर्थ है ।

2.सामान्य अर्थ-व्यव्हार में परिवर्तन होना .सीखना ।

3.गिल्फोर्ड -" व्यवहार के कारण में परिवर्तन होना अधिगम है " ( अधिगम स्वय व्यव्हार में परिवर्तन का कारण है .)।

4.स्किनर -" व्यवहार के अर्जन में उन्नति की प्रक्रिया ही अधिगम है "।

5.काल्विन -"पहले से निर्मित व्यवहार में अनुभव द्वारा परिवर्तन ही अधिगम है "।

6.अधिगम की पूरक प्रक्रिया विभेदीकरण या विशिष्टीकरण भी मानी गई है .जैसे -खिलोने के सभी घटकों को अलग कर फिर से जोड़ना ।

7.अधिगम सदैव लक्ष्य-निर्दिष्ट व सप्रयोजन होता है .यदि अधिगम के लक्ष्यों को स्पस्ट और निश्चित कथन में दिया जाये तो अधिगमकर्ता के लिए अधिगम अर्थपूर्ण तथा सप्रयोजन होगा ।

8.अधिगम एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है जैसे विकास ।

9.अधिगम व्यक्तिगत होता है अर्थात प्रत्येक अधिगमकर्ता अपनी गति से,रूचि,आकांक्षा ,समस्या,संवेग,शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य आदि के आधार पर सीखता है .इसमें अभिप्रेरनात्मक करना भी होते है ।

10.अधिगम सृजनात्मक होता है .अर्थात अधिगम ज्ञान व अनुभवों का सृजनात्मक संश्लेषण है ।

11.क्रो एव क्रो के अनुसार -"समीक्षात्मक चिंतन/क्रिटिकल थिंकिंग में जिस प्रकार निम्नलिखित मानसिक क्रियाएं होती है उसी प्रकार यह अधिगम से गहरे स्तर पर सम्बंधित है -

  1. दिशा 
  2. व्यख्या
  3. चयन
  4. अंतर्दृष्टि 
  5. सृजन
  6. समालोचना 
12.अधिगम को प्रभावित करने वाले कारक :

  • बालक के लिए कारक : - 1.सिखने की इच्छा ,2.शैक्षिक प्रष्ठभूमि ,3.शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य.4.परिपक्वता , 5.अभिप्रेरणा , 6.अधिगम कर्ता की अभिवृति, 7. सिखने का समय व अवधि .
  • 8.बुद्धि 
  • अधिगम प्रक्रिया के कारक :- 1. अध्यापक का विषय ज्ञान ,2.शिक्षक का व्यवहार 3.शिक्षक को मनोविज्ञान का ज्ञान ,4. शिक्षण विधि, 5.व्यक्तिगत भेदों का ज्ञान, 6.शिक्षक का व्यक्तित्व , 7.पाठ्य-सहगामी क्रियाएं ,8. अनुशासन की स्थिति.
13. अधिगम उत्तरोत्तर सामंजस्य की प्रक्रिया है .
14.वुद्वर्थ -"नविन ज्ञान और नविन प्रतिक्रियाओं को प्राप्त करने की प्रक्रिया सिखने की प्रक्रिया है ".
15.शिक्षण और अधिगम में सम्बन्ध -यह समान प्रक्रियाएं है ,शिक्षण में शिक्षक,बालक व पाठ्यक्रम है . शिक्षा में शिक्षण ,अधिगम और अनुभव है 
16. शिक्षक जिस प्रकार से पाठ्यक्रम को पढाता है वह प्रक्रिया शिक्षण है . इसमें सिखाना भी निहित होना चाहिए .अतः शिक्षण-अधिगम मिलकर ही पूर्णता होती है .
17. ---अधिगम के नियम ----पावलाव ,स्किनर आदि ने जिस प्रकार अधिगम सिद्धांतवादों का प्रतिपादन किया उसी प्रकार थार्नडायिक ने अधिगम के नियमो का प्रतिपादन किया है - 

  • तत्परता का नियम: जब तक कोई अधिगम कर्ता सिखने के लिए अपने मन से तत्पर नहीं है तब तक अधिगम कठिन है .
  • अभ्यास का नियम : क्युकी शिक्षा,शिक्षण और अधिगम का मूल उद्देश्य विद्यार्थिओं में व्यवहारगत परिवर्तन लाना है . अतः व्यवहार में निरंतर अभ्यास न होने पर उसे भूल जाते है अतः अभ्यास अधिगम में बहुत महत्वपूर्ण है .(प्रयत्न एवं भूल का सिध्धांत).
  • प्रभाव का नियम :  जिस बात की जीवन उपयोगिता जितनी अधिक होगी बालक सिखने के लिए उतना ही अधिक प्रभावित होगा . साथ ही पूर्वज्ञान के प्रभाव में भी वह नए ज्ञान का अधिगम करता है .
18.अधिगम के सिद्धांत :-
साहचर्यवादी
1.अनुकरण सिद्धांत - अनुकरण का सिद्धांत प्लेटो और अरस्तु की उपज है . इसके अनुसार अधिगम की प्रक्रिया में सुनी हुई बात की अपेक्षा देखि हुई या किसी परिस्थिति में घटित हुई बात का प्रभाव अधिक होता है . यही करना है की विद्यार्थी शिक्षक का अनुकरण (नक़ल) करते है .  
2. प्रयत्न एवं भूल का सिद्धांत - थार्नडायिक इस सिद्धांत के प्रणेता है . उनके अनुसार अधिगम , परिस्थिति और उसके परिणामों क बीच पारस्परिक संबंधो का परिणाम है . किसी कार्य को करने का प्रयत्न तो कोई भी कर सकता है किन्तु उसमे सुधर मस्तिस्क की विशेष प्रक्रिया है . मस्तिस्क विकसित होता जाता है और जीरो-इरर की स्थिति आदर्श होती है . नए प्रयोग और नेई खोज आदि के लिए इस सिद्धांत अत्यंत उपयोगी है . 

व्यव्हारवादी - 1. पावलाव का सिद्धांत - इसे पावलाव का अनुकूलित अनुक्रिया सिद्धांत /क्लासिकी अनुबंध//शाश्त्रीय अनुबंध सिद्धांत वाद भी कहते है : यह व्यव्हार वादी सिद्धांत है . इसको मानने वालों में पावलाव,स्किनर , वाटसन आदि है . पावलाव ने कुत्तों पर, स्किनर ने चूहों पर, और वाटसन ने खरगोश के बच्चो पर प्रयोग किये. इस सिद्धांत में - " स्वाभाविक उद्दीपक के साथ कृत्रिम उद्दीपक को इस प्रकार अनुबंधित किया जाता है की अनुक्रिया अंत में कृत्रिम उद्दिपक से ही अनुबंधित रह जाती है . इसलिए इसे उद्दीपन-अनुक्रिया -सिद्धांत भी कहते है . अधिगम की दृष्टि से देखें तो बालक को लोरी सुनाना ,प्रशंसा  करना आदि उद्दीपक से धीरे -धीरे जो अनुक्रिया होती है वह अंततः आदत बन जाती है . अर्थात उत्तेजक द्वारा उत्प्रेरण का इस सिद्धांत में बड़ा महत्त्व है . 
नोट - कुत्ते की लार का प्रयोग इसी सिद्धांत में पावलाव ने किया था .   

2. स्किनर का सिद्धांत - इसे क्रियाप्रसूत अनुबंधन का सिद्धांत भी कहते है . यह एक अधिगम प्रक्रिया है जिसके द्वारा अधिगम अनुक्रिया को अधिक संभाव्य और द्रुत बनाया जाता सकता है . स्किनर की मान्यता है की मानव का समग्र व्यवहार  क्रियाप्रसूत  पुनर्बलन है . जब कोई बात  किसी व्यव्हार के किसी रूप को पुनर्बलित करती है तो उस व्यव्हार की आवृति अधिक होती है . प्रबलन जीतना अधिक शक्तिशाली होगा व्यवहार की आवृति उतनी ही अधिक होगी . प्राकृतिक प्रबलन सबसे अधिक शक्तिशाली होते है . अभिवृतिया, जीवन -मूल्य आदि कृत्रिम है परन्तु स्थाई प्रबलन है . .
विशेष -
  1. सर्कस में पशु-पक्षियों के प्रशिक्षण को समझने में स्किनर का प्रयोग सफल हुआ है .
  2. स्किनर से पहले उद्दीपन-अनुक्रिया सिद्धांत पर वाटसन और थार्न डायिक ने भी प्रयोग किये थे . 
  3. थार्न डायिक ने उद्दीपक भोजन रखकर बिल्ली को संदूक का दरवाजा खोलना सिखा दिया .


गेस्टाल्टवादी - 
1. सूझ का सिद्धांत .- व्यव्हार वादी वैज्ञानिकों ने पशु-पक्षियों पर प्रयोग निष्कर्ष मानव के अधिगम से जोड़े जो अधिगमकर्तायों को स्वीकार नहीं था . इन वैज्ञानिकों का मानना है की कुछ सभ्यता तो हो सकती है लेकिन मानव का अधिगम पूरी तरह पशु-पक्षियों के अधिगम की भांति नहीं हो सकता . अधिगम सदैव प्रयोजनपूर्ण होता है . और पशु पक्षियों पर किये जाने वाले कई प्रयोग पूरी तरह कृत्रिम वातावरण पर आधारित होते है . यह सिद्धांत ज्ञान के उद्देश्पुर्ती पर बल अधिक नहीं देता है बल्कि कौशल के विकास पर अधिक बल देता है . सूझ द्वारा अधिगम सिद्धांत केलिए  कोहलर ने प्रयोग किये है . 
 विशेष- गेस्टाल्टवाद एक जर्मन शब्द है जिसका अर्थ है रूप -आकार . मनोविज्ञान की यह शाखा मानती है मनुष्य सहज परिस्थितियों में चीजों को समझते हुए उसका एक रूपाकार अपने मस्तिस्क में स्थापित कर लेता है . ...
(समाप्त)
   

बच्चे कैसे सोचते और सीखते है ,बच्चे शाला प्रदर्शन में सफलता प्राप्त करने में क्यों और कैसे असफल होते है ...

बच्चे कैसे सोचते और सीखते है ,बच्चे शाला प्रदर्शन में सफलता प्राप्त करने में क्यों और कैसे असफल होते है ...
1.पारंपरिक शिक्षण-प्रणाली बालक परीक्षा -केन्द्रित अध्ययन करता रहा है इस कारण उसका चिंतन भी परीक्षा में अधिक अंक प्राप्त करना रहा है .
2.इसी कारण से उनके कौशलों के विकास पर प्रश्न चिन्ह रहा है .नयी पद्धतियों ने शिक्षण-प्रणाली को बाल-केन्द्रित और कौशल आधारित बनाया है इससे बालको की सोच और द्रष्टिकोण में परिवर्तन आया है .
3.बच्चो के स्कूली प्रदर्शन में असफलता के निम्नलिखित कारण माने गए है -

  1. अभ्यास की कमी 
  2. तत्परता की कमी 
  3. अनुकूल वातावरण का आभाव
  4. छात्र का शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य 
  5. प्रेरणा का आभाव 
4.असफलता से बचने या निराशा से उबरने के उपाय - 

  1. बार्डर-लाईन/ख़राब प्रदर्शन की सीमा में है -उनकी परामर्श /उपचारात्मक प्रणाली सुद्रढ़ करना.
  2. असफलता के भय से मुक्त कराना और विषय के प्रति मैत्री भाव स्थापित करना. टू रिलीज द फोबिया .
  3. जो पहले से असफल है उसे असफलता की निराशा से उबारना और सतत संपर्क के माध्यम से नयी प्रेरणा भरना.
  4. पुनरावृति/पुनः प्रेरणा का लगातार प्रयोग करना.
  5. असफलता में निर्देशन व परामर्श की बड़ी भूमिका होती है .असफलता बालकों को अनेक प्रकार से आत्महत्या तक ले गई है .अतः शिक्षक और शिक्षा प्रणाली को मिलकर असफलता को शिक्षशात्र में सफलता के सूत्र में बदलने का कार्य करना है .

Friday, 28 October 2016

वर्ण विचार

वर्ण -
मुख से उच्चारित ध्वनियों को लिखित रूप देना वर्ण कहलाता है .

वर्ण भेद -
1.स्वर  2. व्यंजन
  • स्वर -इनका स्वतंत्र उच्चारण संभव है .
  • अ , आ  , इ ,ई ,उ ,ऊ ,ऋ , ए ऐ.ओ औ ,/ऑ
  • ऋ - को हिंदी में अशुद्ध स्वर माना गया है .
  • हिंदी में शुद्ध स्वरों की संख्या 10 होती और कुल 11 है .
  • स्वरों का वर्गीकरण -
  • उच्चारण की अवधि ( मात्राकाल ) के आधार पर तीन भागो में किया गया है -
  • 1. हस्व स्वर - अ,इ,उ, ऋ ( कुल 4 ) इन्हें बोलने में समय कम लगता है .इन्हें मूल स्वर ,एकमात्रिक स्वर या लघु स्वर भी कहा जाता है .
  • 2.दीर्घ स्वर - आ,ई ,ऊ,ए,ऐ,ओ,औ (कुल 7 ) ,इन्हें बोलने में हस्व स्वर से दुगना समय लगता है .इन्हें संयुक्त या गुरु स्वर भी कहते है .
  • ओ,ए को शुद्ध संयुक्त स्वर माना गया है .
  • ए ,ऐ,ओ,औ को संधि स्वर या संध्यक्षर भी कहा जाता है .
  • अ+अ= आ                              इ+इ=ई        उ+उ=ऊ         अ+इ=ए       अ+ए=ऐ        अ+उ=ओ        अ+ओ=औ     
  • 3.प्लुत स्वर -प्रत्येक स्वर अपने आप में प्लुत होता है . इनके उच्चारण में हस्व स्वर से तीन गुना समय लगता है . जैसे ओइम/ओइह
  • उच्चारण के आधार पर स्वरों को दो भागो में विभाजित किया गया है
  • 1.अनुनासिक स्वर - उच्चारण में वायु मुख व नाक दोनो से साथ -साथ बहार निकलती है . स्वर के ऊपर चन्द्रबिन्दु लगाकर अनुनासिक बनाया जाता है .
  • 2.निरनुनासिक स्वर -उच्चारण में वायु केवल मुख से बहार निकलती है .सभी 11 स्वर निरनुनासिक स्वर है .
  • जिव्हा की क्रियाशीलता के आधार पर तीन प्रकार के स्वर माने गए है .
  • 1.अग्र स्वर-उच्चारण में जिव्हा का अग्र भाग सक्रिय रहता है .जैसे -इ,ई,ए,ऐ.
  • 2.मध्य स्वर-उच्चारण में जिव्हा का मध्य भाग सक्रीय रहता है . जैसे-अ .
  • 3.पश्च स्वर -उच्चारण में जिव्हा का पीछे का भाग सक्रीय रहता है . जैसे - आ,उ,ऊ,औ,ओ.
  • ओष्ठ की गोलाई के आधार पर दो प्रकार के स्वर माने गए है .
  • 1.वृतमुखी स्वर -उच्चारण में ओष्ठों का आकार वृत्ताकार (गोल) हो जाता है . ( उ,ऊ,ओ,औ)
  • 2.अवृतमुखी स्वर- उच्चारण में ओष्ठों का आकार गोल न होकर अन्य प्रकार का हो जाता है .(अ,आ,इ,ई,ए,ऐ)
  • मुखाकृति के आधार पर स्वर 4 प्रकार के होते है -
  • 1.संवृत -उच्चारण में कम मुख खुलता है .(इ,ई,उ,ऊ )
  • 2.अर्धसंवृत -उच्चारण में संवृत से थोडा अधिक मुख खुलता है .(ए,ओ)
  • 3.विवृत -उच्चारण में मुख सबसे अधिक खुलता है .(आ)
  • 4.अर्धविवृत -विवृत से कम और अर्धसंवृत से थोडा अधिक मुख खुलता है ( अ,ऐ,औ).
  • अं को अनुस्वार कहते है .
  • अः विसर्ग की श्रेणी में आता है .

व्यंजन 

इनका उच्चारण स्वरों की सहायता से होता है . हिंदी में 33 व्यंजन माने जाते है .इन्हें तीन भागो में बांटा गया है .
  • स्पर्श व्यंजन - 
  • उच्चारण स्पर्श -कंठ ,तालू,मूर्धा ,दन्त,ओष्ठ .
  • वर्ण संख्या 25 होती है ( क से म तक ) 
  • क ,च,ट,त,एवं प वर्ग से सभी वर्ण इसमें आते है .
  • अन्तस्थ व्यंजन -
  • इसमें उच्चारण जीभ ,तालू,वर्त्स ,मूर्धा ,दन्त ,ओष्ठ आदि को परस्पर टकराने से होता है ,लेकिन पर्ण स्पर्श नहीं होता .
  • इसमें वर्ण संख्या 4 होती है -य,र,ल,व्.
  • इन्हें अर्धस्वर तथा यण भी कहा जाता है .
  • उष्म व्यंजन -
  • इसमें उच्चारण किसी रगड़ या घर्षण से उत्पन्न उष्म वायु से होता है .
  • इसमें वर्ण संख्या 4 होती है .(श,ष,स,ह)
व्यंजनों का वर्गीकरण मुख्य रूप से दो प्रकार से होता है .
  • 1.उच्चारण स्थान के आधार पर /प्रयत्न स्थान के आधार पर -
व्यंजन+स्वर = प्रयत्न 
वर्ग                        उच्चारण स्थान 
क वर्ग-क ,ख,ग,घ,ड,   (कंठ्य)
च वर्ग-च,छ,ज,झ,       (तालव्य)
ट वर्ग-ट,ठ,ड,ढ,ण,      (मूर्धन्य)
त वर्ग-त,थ,द,ध,न     (दन्त्य)
प वर्ग-प्,फ,ब,भ,म     (ओष्ठ्य)
          य,र,ल,व् ------(अन्तस्थ)
          श,ष,स,ह (काकल्य)----उष्म 

          

पर्यावरण अध्ययन पाठ्यक्रम

विषय -वस्तु 


  • हमारा परिवार हमारे मित्र -
  • परिवार और समाज में सहसंबंध -परिवार के बड़े बुढे ,बीमार ,किशोर,विशिष्ट आवश्यकता वाले बच्चो की देखभाल 

  • हमारे पशु ,पक्षी - हमारे पालतू पशु पक्षी,माल वाहक पशु ,हमारे आस-पास के परिवेश में जीव  जंतु .
  • हमारे पेड़-पौधे -स्थानीय पेड़ -पौधे ,पेड़-पोधे और मनुष्य की अंत -निर्भरता , वनों की सुरक्षा उनकी आवश्यकता और महत्व .
  • हमारे प्राकृतिक संसाधन -प्रमुख प्राकृतिक संसाधन ,उनका संरक्षण ,उर्जा के पारंपरिक और नवीनीकृत एवं अनविनिक्रित स्त्रोत .

  • खेल और कार्य -
  • खेल ,व्यायाम और योगासन 
  • पारिवारिक उत्सव,विभिन्न मनोरंजन के  साधन-किताबें,कहानियां,कठपुतली प्ले,मेला आदि.
  • विभिन्न काम-धंधे ,उद्योग और व्यवसाय .
  • आवास -
  • पशु,पक्षी,और मनुष्य के विभिन्न आवास,आवास की आवश्यकता और स्वस्थ्य जीवन के लये आवास की विशेषताएं.
  • स्थानीय इमारतों की सुरक्षा ,सार्वजनिक सम्पति,राष्ट्रीय  धरोहर और उनकी देखभाल.
  • उत्तम आवास और उसके निर्माण में प्रयुक्त सामग्री.
  • शौचालय की स्वच्छता,परिवेश की साफ-सफाई और अच्छी आदतें .
  • हमारा भोजन -
  • भोजन की आवश्यकता ,भोजन के घटक .
  • फल एवं सब्जियों का महत्त्व पौधो के अंगो के अनुसार फल ,सब्जियां .
  • भोज्य पदार्थो का स्वास्थ्यवर्धक संयोजन .
  • विभिन्न प्रकार के भोजन और उन्हें पकाने की विधिया.
  • उत्तम स्वाथ्य हेतु भोजन की स्वच्छता और सुरक्षा के उपाय .
  • पानी और हवा-
  • जीवन के लिए पानी और हवा की आवश्यकता .
  • स्थानीय मौसम ,जल चक्र और जलवायु परिवर्तन .
  • पानी के स्त्रोत ,उसके सुरक्षित रखरखाव और संरक्षण के तरीके .
  • संक्रमित वायु और पानी से होने वाले रोग ,उनका उपचार और बचाव ,अन्य संक्रामक रोग .
  • हवा,पानी,भूमि का प्रदुषण उससे सुरक्षा ,विभिन्न अपशिष्ट पदार्थ और उनका प्रबंधन उचित निस्तारण .
  • भूकंप,बाढ़,सुखा,आदि आपदाओं से सुरक्षा और बचाव के उपाय .
  • आवागमन और यातायात -
  • आवागमन के साधन ,थल,जल,वायु संबधी साधन और उनका महत्त्व .
  • संचार की प्राचीन एवं नवीनतम आधुनिक सुविधाएँ.
  • सुरक्षित यातायात और संकेतो का महत्त्व 
  • प्रमुख राष्ट्रीय और राजकीय राजमार्ग,वायुमार्ग.
  • जलयान और वयुयान तैयार करने के राष्ट्रीय -अंतर्राष्ट्रीय स्थल आदि .
  • प्राकृतिक वस्तुएं और उपज -
  • सूती ,ऊनी ,रेशमी कपडा निर्माण के रेशे और उनका उत्पादन.
  • मिटटी ,पानी,बीज और फसल का संबध ,जैविक-रासायनिक खाद.
  • विभिन्न फासले ,उनके उत्पादक क्षेत्र .
  • फसल उत्पादन के लिए आवश्यक कृषि कार्य और उपकरण .
  • मानव निर्मित साधन एवं उसके क्रियाकलापों का प्रभाव -
  • वनों की कटाई और शहरीकरण ,पारिस्थितिक संतुलन पर प्रभाव.
  • ओजोन क्षय ,अम्लीय वर्षा,ग्लोबल वार्मिंग,ग्रीन हॉउस प्रभाव आदि.
  • आपदा प्रबंधन 
  • पर्यावरण पास एवं दूर -
  • सजीव-निर्जीव ,समानताएं ,असमानताएं 
  • शरीर के बहा अवं आतंरिक अंग उनकी रचना एवं कार्य .
  • अपने गाँव ,शहर की जिले की स्थिति,राज्य और देश ,पंचायत और शासन 
  • पर्वत,पठार ,नदियों की जानकारी और उनका भौगोलिक महत्त्व.
  • पृथ्वी,सूर्य,चन्द्रमा और तारों का सम्बन्ध ,दिन-रात का होना ,ऋतुओं का बनना आदि .
पर्यावरण का अध्ययन Pedagogical issues